गंगा की पुकार
गंगा की पुकार
हार नहीं मानूंगा।
जीवन इक संग्राम यहां है
वरदान नही मांगूंगा
समर शेष है जीवन का जब तक
मैं हार नहीं मानूंगा।
चाहे कितनी बाधाएं आएं
आंधी आएं, विपदाएं आएं
मोड़ बड़े हों या रोक बड़े
टकराऊँगा, पर हार नही मानूंगा।
जन गण मन की प्रचंड वेदना
मैं तुम तक पहुंचाऊंगा
इन नैनों में छिपी यंत्रणा
मैं तुम को दिखलाऊंगा।
मैं सत्ता के महाशीर्ष तक
दर्द जन जन का पहुंचाऊंगा
जब तक रक्षित न होगा राज धर्म
मैं नित नित लिखता जाऊंगा।
धर्म के रक्षक भयाक्रांत हो
भक्षक से जब मिल जाएंगे
धर्म की रक्षा मुश्किल है तब
न्याय कहां मिल पाएंगे।
ये मत सोचो कि लघु मात्र हूँ
निर्बल, दुर्बल, शक्तिहीन हूँ
मैं स्याही की वो अमिट बूंद हूँ
जो मस्तक पर छप जाऊंगा।
किंचित कहीं विजय मिल जाये
पुष्पादित अस्मित को अर्थ मिल जाये
मैं तनिक नहीं सुस्ताऊंगा
अविचल चलता जाऊंगा।
नव जीवन मार्ग प्रशस्त तक
मैं हार नहीं मानूंगा
अविरल, अहर्निश चलता जाऊंगा
पर वरदान नहीं मांगूंगा।
