गम की कोई वज़ह नहीं
गम की कोई वज़ह नहीं
जब आस-पास महक रहा है,
खामोश सुकून का एहसास
तड़पते वादियों में से
जब आ रही है मोहब्बत की पुकार
तो गम की कोई वज़ह नहीं
बनावटी आसुओं की बातें
कहानी में अब और नहीं
बर्फ की तरह जम गए हैं
वो ग़म, वो दर्द के लम्हें
उन्हें अब और अश्कों से पिघलाना नहीं
हक़ीक़त के परों में,
झूठे भ्रम की अब और उड़ान नहीं
घुटन की धूप धीरे-धीरे ढल रही है
तो, गम की कोई वज़ह नहीं
सवालों का भंवर समेट लो अब
हँसते जुगनुओं ने सीधे दिल पर दस्तक दी
गम की कोई वज़ह नहीं, कोई कारण नहीं
मिटते जा रहे हैं गम के ग़मगीन निशाँ
उम्मीद की साहिल पर इसको और रोको नहीं
जब कोई पुराना ज़ख्म दिल की धडकन में
रहता ही नहीं
तो उसे दूर तक सफ़र करने की जरूरत नहीं
अब जो बादलों ने बताया है
गम का कुछ कहना नहीं
तो इसे और सहलाने की जरूरत नहीं
दिल कोरे काग़ज़ ने गहरी चोट खाई है
उसे और झूठ के अश्कों से वाकिफ करना नहीं
गम की कोई वज़ह नहीं
