STORYMIRROR

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Classics Inspirational

4  

हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Abstract Classics Inspirational

गजल : हद बेहद

गजल : हद बेहद

1 min
342

हदों को लांघने का देखो रिवाज चल पड़ा है 

इसीसे तो दुखों से आज बेहद पाला पड़ा है 


सागर भी भूल रहे हैं अपनी हदों की सरहदें

छूने को आसमान "सुनामी" सा आ खड़ा है 


हदों से बाहर निकल के नंगा नाच रहा है झूठ 

बेहद डरा हुआ सच कोने में दुबका सा पड़ा है 


जरा सी ढील क्या दी बेलगाम हो गई है जुबां 

जिधर देखो उधर ही जुबां का ही तो लफड़ा है 


हदों में आजकल कौन रहना चाहता है "हरि" 

हदों को तोड़ने का आनंद ही बेहद तगड़ा है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract