घनघोर घटा
घनघोर घटा
गननौर घटा जब छाने दे,
सूरज के आहोश मे समा ने दे,
जरमर जरमर पानी की बुंद गीरा दे,
धरतीकी तू प्यास बुजा दे,
तरुवर सब चूपचाप खडे है,
पत्ते पत्ते सूख रहे है ।
धरती में अगन लगी है,
बार बार वह हील रही है।
इंसान भी अब थक चुका है,
मिट्टी की खूश्बु ढुंढ रहा है,
अब तो अपनी कृपा वर्षा दे,
मृदुल मनकी अरजी सुनके,
जरमर पानी बषॉ दे,
धरतीको अमृत पीला दे
कुदरत का सौदयँ फिर जगा दे,
हरीयाली चारो ओर फेला दे,
बादल में बिजली चमका दे,
अब तो पानीकी दो चार बुंद गीरा दे ,
धरती और आकाश का मिलन करवा दे,
क्षितिज पर मेघ धनुष दिखा दे।
