STORYMIRROR

SUHAS GHOKE

Abstract

3  

SUHAS GHOKE

Abstract

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min
206

कुछ इस तरह था मंज़र मैं बैठा रहा रात तक 

चांद तारो से अपनी तन्हाई बतलाता रहा रात तक 


लबो पे उदासी आंखों में नमी लिए 

ग़म - ए - तरन्नुम मै आसमां को सुनाता रहा रात तक 

      

इन दिनों मेरे हयात मैं ना किसी की रफाकत थी 

फ़ोन में उसकी तस्वीर देख मुस्कुराता रहा रात तक 


हा ज़रूर होगा वो मुकम्मल एक हसीन ख्वाब की तरह 

शब- ओ - रोज़ यही गीत गुनगुनाता रहा रात तक 


ये जो बंजर है मेरे दिल की जमीं 

माज़ी की याद मैं दिल मुरझाता रहा रात तक!


        



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract