Participate in the 3rd Season of STORYMIRROR SCHOOLS WRITING COMPETITION - the BIGGEST Writing Competition in India for School Students & Teachers and win a 2N/3D holiday trip from Club Mahindra
Participate in the 3rd Season of STORYMIRROR SCHOOLS WRITING COMPETITION - the BIGGEST Writing Competition in India for School Students & Teachers and win a 2N/3D holiday trip from Club Mahindra

Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Abstract Drama


4.5  

Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Abstract Drama


गधों के सींग

गधों के सींग

1 min 199 1 min 199

गधों के भी आज सींग निकल आये है

ये गधे अश्व की खाल पहनकर आये है


वो भूल गये अपनी मूर्खता का सबब,

पैसे के मद में खुद को समझ रहे रब


चापलूसों के दम पे आजकल के गधे

हमें जिंदगी की रेस में हराने आये है


गधों के भी आज सींग निकल आये है

अपने को गधे शहंशाह समझ आये है


कलियुग के आजकल के दौर में,ये गधे,

तुच्छ सींगों को तलवार समझ आये है


ये गधे भूल गये,हम जंगल के राजा है

ये झुंड में शेर को ललकारने आये है


इन गधों को मुँह की ही खानी होगी,

ये एवरेस्ट पर्वत से टकराने आये है


गधों के भी आज सींग निकल आये है

ये तम होकर,रोशनी को डराने आये है


पर जीत तो आखिर सत्य की होती है,

सत्य के आगे हर अंधेरे की माँ रोती है,


गधों के भले आज सींग निकल आये है

घोड़ों के आगे झुक रही इनकी निगाहें है


गधों के सींगों में फैली अंधेरे की बांहे है

वो मिटेगी जरूर हम जो सत्य-गायें है


मुझे पुरुष के पुरुषार्थ की कसम है

गधों के सींग को तोड़ेंगे जरूर हम है


गधों को उनकी औकात बताने आये है

हम शेर है, शेर की तरह ही जीने आये है।


Rate this content
Log in

More hindi poem from Vijay Kumar उपनाम "साखी"

Similar hindi poem from Abstract