एक परी
एक परी
एक परी से हुआ है जन्मो जन्म का प्रेम मेरा
परी जब से उड़ी तब से दिल है बेचैन मेरा
सही न हुआ अब तक कोई भी आभास मेरा
तुमसे बिछड़कर है जीवन बस वनवास मेरा
मन के सिंहासन पर अब सूनापन अभिषिक्त
मेरी इस गहन पीड़ा को एक मेरे अतिरिक्त
या तो जानते हैं राम या जानती हैं जानकी
हृदय की असमर्थता प्रिये तुम नहीं जानतीं
हृदय के महल से मुझे जब से तुमने त्यागा
मैं सोया नहीं पलक भर मैं वर्षों तक जागा
हर श्वास में मेरे तुम्हारी प्रतीक्षा का कण है
तुम्हें निकट लाता मेरे हर जाता जो क्षण है
ये जानते हैं लक्ष्मण या उर्मिल ही जानतीं
हृदय की असमर्थता प्रिये तुम नहीं जानतीं
प्रेम की आस लगा कर ऐसे मृदुल हुआ हूँ
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में इतना व्याकुल हुआ हूँ
इस प्रकार तुम्हारी स्मृति का मुझपर है आसन
तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारा ही है शासन
जैसे मानते हैं भरत और माण्डवी भी मानतीं
हृदय की असमर्थता प्रिये तुम नहीं जानतीं
न जाने कितनी बार मैंने भाग्य को मनाना चाहा
एक नगर स्वप्न का मैंने तुमको लेकर बसाना चाहा
मगर सँवरने से पहले ही सब छिन्न भिन्न हो गया
मन का एक कोना फिर जीवन से खिन्न हो गया
मेरे प्रेम की नगरी को अयोध्या है पहचानती
हृदय की असमर्थता प्रिये तुम नहीं जानतीं।

