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Phool Singh

Inspirational

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Phool Singh

Inspirational

एक प्रार्थना

एक प्रार्थना

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अस्तित्व पर उनके प्रहार करों न

जीवन में ये अपराध करों न

कण-कण में जो रमें है बंधु, उनसे खुद दूर करों न।।


काल्पनिक है यदि कथा भी उनकी

तुम आदर्श स्वीकार करों न

कौन कहता उनकी पूजा करों तुम, पर उनके का जिक्र करों न।।


वक्त बदल रहा धीरे-धीरे 

मूल्यांकन स्थिति का थोड़ा करों न

समाप्त हो रही दया-धर्म अब, अपने ईश्वर का थोड़ा ध्यान करों न।।


सदा नैतिकता की परीक्षा होती 

शांति से अपने काम करों न 

धूर्त, चालाक सदा बच निकलते, स्वार्थ का उनको प्रतीक कहो न।।


अधर्म की सूली सरल ही चढ़ते

इस बात पर अमल करों न

कुंठा ग्रस्त हो रहा है मानव, स्वयं को बदलने का प्रयास करो न।।


सहनशीलता खो रही सबकी

वाणी को अपनी काबू करो न

काम, क्रोध में हो रहे अंधे, हर किसी पर विश्वास करो न।।


मात-पिता वृद्धाआश्रम जाते 

जरा अकेलापन उनका याद करों न

एकल परिवार का चलन बढ़ा है, अवसाद के शिकार तुम उन्हें कहो न।।


सफल होने की जैसे हौड़ लगी है 

बुरा बच्चों पर असर कहो न

रिश्ते-नाते खत्म हो रहे, जज्बातों की इसे कमी कहो न।।


नशा, मोबाइल की लत है बुरी 

किताबों से उसको दूर कहो न

सेवा-समर्पण की क्या उम्मीद है उनसे, प्रणाम की भी आश करो न।।


दंगे-फसाद में उलझे रहते

इससे कोर्ट-कचहरी की चांदी कहो न

अगले पल जाने क्या हो जाएं, इसे हर स्थिति में स्वीकार करो न।।


हां में हां जो कहना सीख लो 

मुसीबतों से खुद को दूर करों न

माफ़ी मांग थोड़ा बचकर निकालो, जो जैसा उसे स्वीकार करो न।


स्वर्ण युग ये धर्म का बंधु

मुक्तहस्त इसे स्वीकार करों न 

मान-आदर्श, संस्कृति ख़त्म हो रही, इस परिवर्तन स्वीकार करों न।।


धर्म की लहर जो बह रही बंधू 

प्रभु का इसे वरदान कहो न

आख़िरी वक्त है धर्म शिखर का, अब इसके बाद की उम्मीद करों न।।


आशा-निराशा में बदल है जाती 

अध्ययन थोड़ा इसका करों न

धर्म के नाम जो रक्तरंजित होते, उनसे धर्म रक्षा की फिर उम्मीद करों न।।


आख़िरी श्वास जो गिन रहा बंधु

उसके साथ तुम आज रहो न

याद करोगे फिर इस वक्त को, अभी इससे ख़ुद को दूर करो न।।


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