एक कविता हर माँ के नाम
एक कविता हर माँ के नाम
मां तेरी आज मुझे बड़ी याद आई है,
और मेरे चेहरे पर एक रुदन सी मुस्कान छाई है ,
तेरे कर्मों को याद दिला, आज लोगों के नेत्रों से आंसू खींच दूंगा,
ऐसा आज इस कवि के जहन में आग लाई है
मां तू बचपन में बनाई करती मेरे बाल, और दीदी की चोटी,
और हमेशा खाने को कहा करती, वही खाना करेला और रोटी
अपने बारे में तुझसे कुछ भी पूछना, मुझे लगता था बेकार ही,
क्योंकि मैं कैसा भी दिखूं , तू कहां करती मेरा बेटा हैं सुपरस्टार जी
मां बेटे से बड़ा, इस दुनिया में कहां कोई रिश्ता है,
मुझे बहुत अच्छा लगता ,जब कोई कहता, तू अपनी मां की तरह दिखता है
ऐ ओ नए जमाने के मतलबी भाई और यारों, मुझसे सब ले लो ,
बस मेरी झोली में, तुम्हारे अपशब्द को चुपचाप सुनने वाली, मेरी मां को दे दो
मां मैं डरता हूं उस दिन से, जब इस घर में तेरी कोई आहट नहीं होगी ,
और मेरे इस थके हुए सर को सहलाने के लिए, तेरी गोद की गर्माहट नहीं होगी
मां मैं माफी मांग कर क्या करूंगा, तेरे इस दुनिया से जाने के बाद ,
उस दिन तो मेरे आंखों में आंसू और दिल में अफसोस की झनझनाहट ही होगी।
