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Prashi Joshi

Abstract


3.5  

Prashi Joshi

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एक कत्ल ईमानदारी का भी

एक कत्ल ईमानदारी का भी

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एक - दो - तीन नहीं हजार होते हैंं

यहां कत्ल ईमानदारी के बार - बार होते हैं । 


मुखोटो पर मुखोंटे और ना जाने कितने चेहरे , 

दिखने में मासूम पर होते राज़ इनमें गहरे , 

वफ़ा की कदर किसे बस बेवफ़ाई आती हैं

क्यों नशे से ही आजकल तन्हाई जाती है । 

परदों के पीछे बेकसूर , खुलेआम गुनहगार होते हैं ,

यहां कत्ल ईमानदारी के बार - बार होते हैं । 


यहां नरम कोई नहीं सभी को सख्त होना हैं

मुठ्ठी भर वक़्त को भी चुटकी भर वक़्त होना हैं

प्रकृति भी कह रही अपनी दास्तां जोर - जोर से , 

कभी ज़ोरदार बारिश , कभी तूफ़ानों के शोर से , 

मरहम बनता कोई नहीं बस ज़ख्मों पे वार होते हैंं

यहां कत्ल ईमानदारी के बार - बार होते हैं । 



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