एक चराग़ था
एक चराग़ था
ज़िन्दगी मोम की तरह पिघल ना गई होती
मुट्ठी में भरी रेत कहीं फिसल ना गई होती !
बेशक एक चराग़ था, कुछ तो कर गुज़रता
बशर्ते ख़ामोश रात उसे निगल ना गई होती !
दुनिया ने अगर करम से नवाज़ा ना होता
जो चली थी बात, दूर निकल ना गई होती !
किसी ने दबे हुए शोलों को हवा दी होगी
कोई तमन्ना फिर क्यूँ मचल ना गई होती !
मिज़ाज की मानिंद हर एक शय बदलती है
वर्ना मोहब्बत कभी यूँ बदल ना गई होती !
