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मोहनजीत कुकरेजा (eMKay)

Abstract

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मोहनजीत कुकरेजा (eMKay)

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एक चराग़ था

एक चराग़ था

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ज़िन्दगी मोम की तरह पिघल ना गई होती

मुट्ठी में भरी रेत कहीं फिसल ना गई होती !

 

बेशक एक चराग़ था, कुछ तो कर गुज़रता

बशर्ते ख़ामोश रात उसे निगल ना गई होती !

 

दुनिया ने अगर करम से नवाज़ा ना होता

जो चली थी बात, दूर निकल ना गई होती !

 

किसी ने दबे हुए शोलों को हवा दी होगी

कोई तमन्ना फिर क्यूँ मचल ना गई होती !

 

मिज़ाज की मानिंद हर एक शय बदलती है

वर्ना मोहब्बत कभी यूँ बदल ना गई होती !


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