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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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एक अर्थी व एक डोली

एक अर्थी व एक डोली

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एक अर्थी निकली, एक डोली निकली

अर्थी को देख डोली बहुत बुरा बोली

तूने क्यों दी नव-जीवन की शुरुआत में,

मुझ सुहागन को ये अभागन की गोली

अर्थी बोली,सुन डोली, तू है बहुत भोली

तुझे भी जाना है वहीं ओ बावली डोली,

जिस रास्ते में जा रही ओ मेरी हमजोली

तुझमे, मुझमे कुछ फ़र्क नहीं है


तू तेरे पिया के पास जा रही है,

में मेरे पिया के पास जा रही हूं

तू जायेगी माटी के पिया के पास,

में जा रही अंतर्यामी पिया के पास,

समझ, सबको वहीं आना है,

वो सबका स्थाई ठिकाना है,

वहां चलती है सिर्फ़ ख़ुदा की बोली


डोली, अर्थी से बोली सबको जाना है

माटी का पुतला ख़ाक में मिल जाना है

तू दिखी मुझे,एकबात औऱ सीखी तुझसे

सच्चा पिया वो है बाकी सब झूठे-रिश्ते नाते

उस परमात्मा की इबादत करना है,

किराये के घर का उपयोग करना है,

सब कर्तव्य निभाने है कमल जैसे,

जग में रहकर पृथक रहना है कीचड़ से,

अंत मे बोली आखिरी ये बात डोली,

एकदिन जुगनू का सूरज से मिलन होगा,

उस दिन इस झूठी काया का दहन होगा,

जीवन पर ख़ुशियाँ मनाते हो

मौत पर क्यों नही गाना गाते हो

मौत भी ख़ुदा का दिया हुआ प्रसाद है,

इसको ग्रहण करे तो,

ये पँछी हो जायेगा सचमुच आज़ाद है


अब डोली को न गिला था, न शिकवा था

वो बोली जा सखी पिया संग खेलना होली

मैं भी जा रही हूं, खुशी के गीत गा रही है

मैं भी माटी के पिया से खेलूंगी धर्म होली



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