एहसास मेरे...
एहसास मेरे...
एहसास मेरे क्या तुमको बताऊं,
तुम सामने हो तो उनको छिपाऊं।
बात इस दिल में ऐसी है मेरे कि,
कह भी न पाऊं, सह भी न पाऊं।
चाहा तुमको उस दिन से जब से,
पहली दफा मैंने देखा था तुमको।
धड़क उठा था दिल ये मेरा जैसे,
तुम मेरे बरसों का इंतेज़ार हो।
इस मन में तेरी तस्वीर बसा कर,
अपने दिल में तुझको छिपाकर।
रहता हूँ मैं सदा बेरुखा, रखता हूँ,
तुझसे ही अपनी नजरें चुराकर।
तलाश मुझे जिस चाहत की थी,
मेरी जन्मों की वो चाहत हो तुम।
कोई भी होती है तकलीफ मुझे,
उन सभी से मेरी राहत हो तुम।
इंतजार करता हूँ बातों का तेरी,
खोया रहता हूँ मैं यादों में तेरी।
चाहूं मैं जब भी सोना रातों में,
तुम ही होती हो ख्वाबों में मेरी।
चाहूं तुमसे ये सारी बातें मैं कहना,
लेकिन सही होगा मेरा चुप रहना।
लब ये जो खुल गए मेरे सामने तेरे,
फिर मुश्किल होगा मेरा पीछे हटना।
मैं कुछ भी कहूँ सामने तुम्हारे पर,
सच ये है कि मेरी चाहत हो तुम।
मुझे ये कहने का हक नहीं क्योंकि,
मेरे रूखे रवैए से आहत हो तुम।
हाँ, मानता हूँ कि दर्द होता है तुम्हें,
मेरे ऐसे बिन बात की नाराजगी से।
पर सही यही होगा कि मैं और तुम,
पहले ही दूर हो जाएं एक दूजे से।
फासले जरूरी हैं ये हमारे दरमियां,
पर ये दिल तुझमें ही धड़कता रहेगा।
दूरियाँ बढ़ा लेंगे मगर ये वादा है मेरा,
कि तेरी खुशियों में मेरा साया रहेगा।
~ देव श्रीवास्तव " दिव्यम " ✍️

