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मधुशिल्पी Shilpi Saxena

Abstract

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मधुशिल्पी Shilpi Saxena

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दूर का सफ़र

दूर का सफ़र

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दूर का सफ़र है

बड़ी ही अनजान ये डगर है


न संगी न साथी बस दिल मे उदासी

वीरानगी का ये कैसा सफ़र है


न आहट है न साया कोई

मुश्किलों मे मेरी ज़िन्दगी का सफ़र है


तन्हा ही है गुज़रा तन्हा ही बसर है

तन्हाई के आलम का बेरंग सफ़र है।


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