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Manisha Manjari

Abstract Tragedy

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Manisha Manjari

Abstract Tragedy

दर्द को यदि भूला दिया,

दर्द को यदि भूला दिया,

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अंधेरी गलियों में अकसर गुम हो जाती हूँ मैं, 

रौशनी को तरसती हैं आंखें मेरी, इतनी घबराती हूँ मैं।

विश्वास ने छला है ऐसा, आस्था भी डराती मुझको, 

रज्जु में भी सर्प है दिखता, कैसे समझाऊँगी तुझको।

अग्निवर्षा ऐसी हुई, शीतलता भ्रम फैलाती है, 

सूरज की वो लालिमा भी, रक्तरंजित सी नजर आती है।

आरोपों के तीरों से, ऐसा चरित्र को भेदा जाता है, 

कि कोयल का मधुर स्वर अब, कानों को विषाक्त कर जाता है।

धारणाएँ ऐसी तोड़ी गई, लज्जा को भी शरम थी आयी, 

अस्तित्व पर वो प्रश्न उठे, प्रकृति भी थी थर्रायी।

अंतर्मन में द्वंद्व उठा, क्रोधित हूँ या बनूँ वैरागी,

मध्यम मार्ग का संग मिला, मौन बना मेरा अनुरागी।

घाव सूख चुके अब मेरे, पर छाप कैसे मिटाऊँगी, 

इस दर्द को यदि भूला दिया, तो शब्द कहाँ से लाऊँगी।


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