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Archana kochar Sugandha

Abstract

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Archana kochar Sugandha

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दिन रात

दिन रात

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रात ने लोरी गाकर सहलाया है 

चाँद-सितारों के पालने में झुलाया है 

दिन की बेरहम अदाएं, अदा करने वालों को 

बड़े प्यार से अपने आगोश में सुलाया है। 


रात गहन काली है मगर मन से उजली है 

काया दिन की उजली है मगर मन से कजली है। 


रात दुनिया-जहान के

हसीन ख्वाबों को सजा देती है 

कुचल कर उन ख्वाबों के फन

दुनिया दिन की मजा लेती है।


रात अपने अँधकार की चादर से 

बदन अधनंगों का छुपाती है 

उस चादर को कर के तार-तार

दिन की उजली किरणें मुस्कराती है।


नापाक इरादों की चाह में

दिन के उजले-उजले बाने 

रात की खामोशी में बड़ी चुपके से 

लिख देते हैं जुल्मों की दास्ताने।


दर्द की पीड़ा से सिसकती रात

जुल्मों की देती है गवाही

उजले बानो की दिग्भ्रमिता में 

दिन की किताबें लिखती हैं उनकी वाह-वाही।



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