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रकमिश सुल्तानपुरी

Abstract

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रकमिश सुल्तानपुरी

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दिलों के लफ्ज

दिलों के लफ्ज

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जन्म -जन्म सनम तेरी ये बन्दग़ी क़ुबूल है  

मिले जो प्यार आपका तो मयकशी क़ुबूल है  


वफ़ा खफ़ा -खफ़ा रही मग़र वफ़ा- वफ़ा रही  

जो आदतों सी बन गयी वो आशिक़ी क़ुबूल है  


है प्यार का मुआमला कुबूल तो जरा मुझे  

मिलो कहीं मग़र मिलो ये हाज़िरी क़ुबूल है


ठहर - ठहर , रुकी- रुकी निहारती रही नजऱ  

ग़मों  की  बेबसी रही कि बेरुख़ी क़ुबूल है


वो आदतन ज़ुबान इश्क़  की लगा है बोलने  

मग़र ज़नाब की हमें वो शातिरी क़ुबूल है


न देख वज़्न क़ाफ़िया बह्र -वह्र ग़लत -सलत  

दिलों के लफ्ज़ बोलती वो शाइरी क़ुबूल है  


कि झूठ की वो दोस्ती क़ुबूल है नहीं मग़र  

चुनौतियों भरी वो यार दुश्मनी क़ुबूल है।


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