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Dr. Anu Somayajula

Abstract

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Dr. Anu Somayajula

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डर घूम रहा है

डर घूम रहा है

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प्रिय डायरी,

सोच रहा है वह

उकड़ूं बैठा,

अपने आंगन, नीम के नीचे।


अब के बारिश ने खेत डुबोए

पानी में, या-

अब के सूखे ने आस डुबाई

पानी में

इन बातों से अब क्या होगा!

डूब चली हैं

सब आशाएं आंखों के पानी में।


एक बखत था, वो महाजन

सूद पे पैसे देता था

शायद अब भी दे दे!

पर बनिए की

दूकान बंद है ताले में

दाना तो घर ना आएगा

बस, सूद भरी झोली ही घर जानी है


अब भी-

उठता है रोज़ सवेरे,

खेतों में मारे है फेरे, बैलों को थामे

खेत जहां अब सूखी धरती है

बैल भी शायद सोच रहे हैं

कब हल बांधा जाएगा!

कब धरती चीरी जाएगी!

कब दाना उपजेगा,

कब चारा घर आएगा !

आध- अधूरा चरवा कर ही

लौटा लाता बैलों को

घर पर अब ना चारा है, ना ही सानी है।


घाट हैं सूने, हाट नहीं हैं

सूनी- सूनी गलियों में अब-

कूकर, शूकर की भी जात नहीं है

हर आंगन था

बच्चों की फुलवारी,

‘सुनते हो’- कहते न अघाती थी घरवाली

डर घूम रहा है अब आंखें फाड़े,

तोड़ न देना चुप्पी के ताले

सूरज देखो, भीतर चल दो

‘बचवा के बापू’-

की अब कोई टेर नहीं ही आनी है।


बेटे सारे शहर गए हैं,

अब शहरों से भी वो उखड़ गए हैं

कल कहलाया था-

“अब मोबाइल में चार्ज नहीं है,

भरवाने को दाम नहीं है,

कुछ ना पूछो-

थोड़ी कही, ज़यादा बूझो”

सर को थामे

अब बैठे हैं, सारे नीम के नीचे,

समझ चुके हैं-

अब से कोई खैर- ख़बर भी ना आनी है।


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