चन्द्रशेखर आज़ाद
चन्द्रशेखर आज़ाद
दोहराती है कलम हमारी,बीती हुई कहानी को।
कैसे भूला जा सकता है,शेखर की कुर्बानी को।।
ताव था उनके मुंछो पर, सिने में ज्वाला धधक रही।
आजादी के मतवाले के, मुखमंडल भी चमक रही।।
सहन नहीं करते थे वो,अंग्रेजों की मनमानी को
कैसे भूला जा सकता है शेखर की कुर्बानी को।।
झोंक दिया आजादी में,वो बचपन के हर सुखों को
देख भला कैसे सकते थे,भारत माँ के दुखों को।।
करूं समर्पित चार पंक्तियां, सच्चे हिंदुस्तानी को।
कैसे भूला जा सकता है शेखर की बलिदानी को।।
जीते जी मैं अंग्रेजों के,हाथ कभी ना आऊंगा।
दृढ़ संकल्प है मेरा ये,मैं हार कभी ना मानुँगा।।
करता हूँ मैं नमन सदा,उस परमवीर स्वाभिमानी को।
कैसे भूला जा सकता है,शेखर की कुर्बानी को।।
