चलते-चलते
चलते-चलते
चलते-चलते हम
कितनी दूर निकल जाते हैं
इतनी दूर, जितनी दूर होते हैं
धरती और आसमाँ।
भूल जाते हैं हम
अपनी ही परछाई
कम लगने लगती है हमें
एक मुट्ठी धूप
कुछ बूँद बारिश
चुटकी भर नमक
एक चम्मच चीनी।
खोने लगते हैं हम
अपनों का साथ
अपनों की बोली
झुठमुठ का गुस्सा
सच्चा सा प्यार
ठहाकेदार हँसी
साथ वाली सुबह-शाम की चाय।
आदत सी हो जाती है हमें
अकेले में बैठना
बालकनी से बाहर देखना
सीने पर किताब रखकर सो जाना।
घंटों फ़ोन पर बातें करना
मोबाइल में डूबे रहना
सुबह की अख़बार को
शाम में दोहराना।
सचमुच, चलते-चलते
कितनी दूर निकल जाते हैं हम।
