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SUNIL JI GARG

Abstract Inspirational

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SUNIL JI GARG

Abstract Inspirational

चलो दोस्त साथ ढूंढें ज़िन्दगी

चलो दोस्त साथ ढूंढें ज़िन्दगी

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जितना समझता हूँ ज़िन्दगी को

उतना ही लगने लगता हूँ खुद को ज़ाहिल

बिना तूफ़ान के ही भरभराने लगती है कश्ती

दीखता है पास पर दूर चला जाता है साहिल


अजब सिहरन है धड़कन में

ज़िंदा हूँ दिमाग को बतलाता हूँ बार बार

अभी मंज़िलों को ढूँढने की फुरसत कहाँ

जब तनहाइयों ने दीं हों कुछ सांसें उधार


अकेलेपन की आदत ने डराया है मुझको

साहिल पर जाओगे तो मिलेगी भीड़

बीच दरिया के यूं ही संभलता फिर रहा हूँ

कश्ती को समझ के बैठा हूँ नीड़


शायद कोई मुझ तक लाएगा नाव

कुछ पूछेगा तो कुछ लगेगा समझाने

शिकवे शिकायत का गुजरेगा दौर

चलो दोस्त साथ ढूंढें ज़िन्दगी के माने।


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