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ca. Ratan Kumar Agarwala

Inspirational

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ca. Ratan Kumar Agarwala

Inspirational

चलो अमन का रामसेतु बनाते हैं

चलो अमन का रामसेतु बनाते हैं

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चलो अमन का रामसेतु बनाते हैं, चलो नफ़रत की लंका ढहाते हैं,

चलो आज मन के रावण को मारते हैं, चलो हर सीता को बचाते हैं।

चलो मन से कलुषिता मिटाते हैं, चलो आज फिर अमन का रामसेतु बनाते हैं,

चलो वानरों की सेना बनाते हैं, चलो मारकर रावण को राम सीता का दरबार सजाते हैं।

 

दानवों का करें विनाश, चलो इंसानों में फिर मानव स्वभाव जागते हैं,

मिटाकर नफरतों का काला घना धुआँ, चलो स्नेह की बगिया सजाते हैं।

वही अयोध्या होगी, वही दशरथ होंगे, रानियाँ होगी, चलो मंथरा सी प्रवृत्ति मिटाते हैं,

राम, लक्ष्मण, भारत, शत्रुघ्न होंगे, सीता और उर्मिला होगी, चलो फिर अयोध्या बनाते हैं।

 

रावण की कुत्सित मनोवृत्ति न हो, चलो मर्यादाओं की एक लक्ष्मण रेखा बनाते हैं,

न कोई धोखा धड़ी, न अस्मिताओं का हनन, फरेब से मुक्त संसार बनाते हैं।

कलियुग की इस कालिमा को चीर दें हम, चलो सतयुग की श्वेत चादर बिछाते हैं,

चलो जलाये सारे द्वेष और क्लेश, चलो आज फिर अमन का रामसेतु बनाते हैं।

 

न हो कोई आरुषि हत्या काण्ड, न हो फिर निर्भया का बलात्कार, ऐसा एक जहां बनाते हैं,

छोटी छोटी बच्चियों का मान मर्दन न हो, भयमुक्त एक वातावरण सजाते हैं।

“भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसी आवाज़ेँ न उठे, देश के गद्दारों को चुन चुन कर मारें,

भारत को बनाये हम विश्व गुरु, सारा संसार मेरे भारत को कौतुक हो निहारें।

 

क्या होगा रावण के पुतले जलाकर, चलो आज हम अपने मन के रावण को मार दें,

क्या होगा मनुज जन्म लेकर, अगर इंसानियत न हो, चलो आज इंसानियत जगा दें।

बच्चे करें बड़ों का सम्मान, न करें माता पिता का अपमान, ऐसा एक परिवार बनाते हैं,

सदगुणों की बयार बहे, अवगुण एक न रहे, बन कर हम  वाल्मीकि, नई रामकथा रचाते हैं।

 

एक ऐसी रामायण जिसमें रावण न हो, सीता का परित्याग न हो, भावों का न हो हनन,

एक ऐसी आचार संहिता हो, जिसमें न हो कदाचार, सुविचारों का ही हो मनन।

कैकेयी का हो जाए मन परिवर्तन, न करना पड़े फिर किसी राम, सीता, लक्ष्मण को वन गमन,

न हो किसी दशरथ के जीवन का यूँ अंत, सारा जग हो एक अयोध्या, नंदन वन कानन।

न करना पड़े फिर किसी भरत को करुण विलाप, न सहना पड़े किसी उर्मिला को विरह संताप,

सारे जहां में फैले सनातन धर्म की खुशबू, चारों दिशाओं में गूंजे माँ सीता प्रभु राम का प्रताप।

फिर जन्म हो महर्षि वाल्मीकि का, फिर अवतरित हो धरा पर कोई तुलसी दास,

मन में गूंजे नव चेतना की शंख ध्वनि, हो भावों में राम, सीता और हनुमान की अरदास।


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