STORYMIRROR

Bhawana Tomar

Tragedy

4  

Bhawana Tomar

Tragedy

चिर निद्रा

चिर निद्रा

1 min
356

ये ज़िम्मेदरियाँ

मुझे सोने नहीं देती

सब कुछ भूल कर

निश्चिंत होने नहीं देती


जिनसे होता है प्यार

उनका अलगाव

कहाँ सोने देता है मुझे

रिश्तों का बिखराव


अधूरी इच्छाएं कुछ

पूरी होने की खातिर

कई बार ले जाती हैं

मुझे नींद की

दहलीज़ तलक

जी उठती हूँ फ़िर

मै जैसे नींद में

बजने लगती है

साँसों में सरगम

दिल जाता है धड़क


खुलते ही आँखें 

फ़िर वही हाल है

ठोकरे खा खा कर

ज़िंदगी बेहाल है

रिश्ते निभाने का हासिल

सिर्फ़ ओ सिर्फ़ मलाल है


जान चुकी हूँ असलियत

तो हर रिश्ते से दूर

अब होना चाहती हूँ

थक चुकी हूँ बहुत

चिर निद्रा में बस

अब सोना चाहती हूँ........... 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy