Rishi kumar
Abstract
माधव सब भूल गये माधव,
वंशी वट यमुना तट की यादें
कुंज गलिन उन रास दिनन,
खरक गांय दुहावन की यादें
फागुन सावन औ वृंदावन,
भवन मनन मन मन की यादें
हम सब उद्धव सहेज धरीं,
छलिया नटवर गिरधर की यादें।
जन्माष्टमी
गाँव
होली
छंद
दोहे
सपने सारे टूट गए अरमान यूँ लूट गए, उम्मीद की कोई किरण नहीं हमने पाई। सपने सारे टूट गए अरमान यूँ लूट गए, उम्मीद की कोई किरण नहीं हमने पाई।
इतनी सी अरज है "नीरज" की, मेरे बजरंगी के प्यारे चरणों में। इतनी सी अरज है "नीरज" की, मेरे बजरंगी के प्यारे चरणों में।
पर मेरे लिए वो भूत या जो भी हो किसी भगवान से कम नहीं है। पर मेरे लिए वो भूत या जो भी हो किसी भगवान से कम नहीं है।
गा रहा हूँ मैं आज, अपने ग़म सभी भुलाने को हौसला शराब का है, हाल-ए-दिल सुनाने को. गा रहा हूँ मैं आज, अपने ग़म सभी भुलाने को हौसला शराब का है, हाल-ए-दिल सुनाने क...
जन-गण-मन से निकला स्वर है हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।। जन-गण-मन से निकला स्वर है हिन्दी राष्ट्र धरोहर है।।
आँखे नम और दिल कुछ भारी भारी है, क़ैद से निकलूँ पर कुछ ज़िम्मेदारी है।। आँखे नम और दिल कुछ भारी भारी है, क़ैद से निकलूँ पर कुछ ज़िम्मेदारी है।।
बिखर गई चहूँ ओर थोपी हुई हर विचारधारा बिखर गई चहूँ ओर थोपी हुई हर विचारधारा
उम्र भी बढ़ रही धीरे-धीरे, ना जवानी फिर से आएगी। उम्र भी बढ़ रही धीरे-धीरे, ना जवानी फिर से आएगी।
मृत्यु पीड़ा का वर्णन करना नामुमकिन है. मृत्यु पीड़ा का वर्णन करना नामुमकिन है.
मैं शब्द कोष से निकला एक अक्षर हूँ शब्द में जुड़ता हूँ तो अपना अस्तित्व लेता हूं। मैं शब्द कोष से निकला एक अक्षर हूँ शब्द में जुड़ता हूँ तो अपना अस्तित्व लेता...
चंपी करते हुए ख्याल आया जीवन का, हर रोज़ संवारती हूँ, निखारती हूँ। चंपी करते हुए ख्याल आया जीवन का, हर रोज़ संवारती हूँ, निखारती हूँ।
जैसा बोलेंगे वैसा लिखेंगे जैसा लिखेंगे वैसा पढ़ेंगे। है कोई ऐसी अन्य भाषा ? जैसा बोलेंगे वैसा लिखेंगे जैसा लिखेंगे वैसा पढ़ेंगे। है कोई ऐसी अन्य भाषा ?
चाय अब चाय नहीं दो घूँट जिंदगी की अमृत सरीखी हो गयी। चाय अब चाय नहीं दो घूँट जिंदगी की अमृत सरीखी हो गयी।
सफर लम्बा है मेरा कि मेरा रास्ता अलग है रात हौसलों ने मुझसे कहा तेरा फैसला अलग है. सफर लम्बा है मेरा कि मेरा रास्ता अलग है रात हौसलों ने मुझसे कहा तेरा फैसला अल...
निर्जन उदास विशाल किताबालय में एक घटना घटी थी। निर्जन उदास विशाल किताबालय में एक घटना घटी थी।
आतुर है उपलब्धियों को पाना, प्रतिष्ठा की होड़ लगा कर बैठा आतुर है उपलब्धियों को पाना, प्रतिष्ठा की होड़ लगा कर बैठा
जो पहुंचा अपने घर वो मजदूर हूँ हाँ मैं मजबूर हूँ। जो पहुंचा अपने घर वो मजदूर हूँ हाँ मैं मजबूर हूँ।
जीवन के पग पग पर मैं तो दिखता हूँ, मैं एक शिक्षक हूँ, गुण छात्रों में भरता हूँ। जीवन के पग पग पर मैं तो दिखता हूँ, मैं एक शिक्षक हूँ, गुण छात्रों में भरता हू...
बस लुत्फ उठाते रहना चाहिए, मुखौटों का खेल खेलते रहना चाहिए। बस लुत्फ उठाते रहना चाहिए, मुखौटों का खेल खेलते रहना चाहिए।
कठिन मार्ग है इस को अपनाना, ईश्वरीय दर्शन को तब तुम पाओ कठिन मार्ग है इस को अपनाना, ईश्वरीय दर्शन को तब तुम पाओ