चांद और तारा
चांद और तारा
सुनो चांद
उस दिन कुछ कसक सी रह गई थी हृदय में
शायद आज उसे मैं बयां कर पाऊं
आज आकर्षण में गुरुत्वाकर्षण है आपके
तो पुनः उधर खिंचता ही खिंचता जाऊ
ये वस्ल जनित सजीले रुप आपके
हाय क्या मैं इस छवि से बच पाऊं
यदि हृदय को शिला का भी रुप दिया
तो भी मंद मंद रश्मि के और भागता जाऊं
सुनो चांद क्यूं करते रहते कलाकारी
हुस्न के आगोश में पिघलता जाऊं
यदि आकर्षण स्वभाव ही आपका
तो विकर्षण उत्पन्न कैसे कर पाऊं
समझे आप मेरे हयात के बेकसी को
आपके दरिया में डूबता ही जाऊं
तूझसे यदि रूठकर करू शिकायत तेरी
तो भी इत्र के कतरा में ही वजू कर पाऊं
हो आज के जैसा ही योग संपूर्ण जीवन में
चांद आपके पास का सितारा बन जाऊं
यदि घनघोर घटा की तमस पूर्ण रात भी हो
फिर भी आपके ही के आंचल का छांह पाऊं
गम में हयात गम ए यक नफस है
तो फिर इसे क्यूं सच्चा मान पाऊं
मुझे तुम्हारे तगाफूल से बिल्कुल शिकायत नही
बस तेरे रअनाइयों पर फना हो जाऊं
चांद इस शील और सोंदर्य सी छवि में
मैं आपके तरफ ही देखता जाऊं
ना ही भ्रमित और ना हि विचलित
अडिग तारा आपका ही हो जाऊं
आप यूं ही साथ रहे आसमान मे
समय समय पर लेखनी चला पाऊं
यदि कोई करे संदेह मेरे वजूद पर
तो प्रमाण के रूप में वही तारा दिखलाऊं
वही तारा दिखलाऊं.............
