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संजय असवाल "नूतन"

Inspirational

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संजय असवाल "नूतन"

Inspirational

चाहता हूं मैं..!

चाहता हूं मैं..!

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चाहता हूं मैं..! 

तोड़ दूं रीति रिवाजों की बेड़ियां,

जिसमे बंधी है आजादी बेटियों की।

चाहता हूं मैं..! 

दूं खुला आसमान बेटियों को,

ताकि उड़ सके वो जी भरकर इस खुली हवा में।

चाहता हूं मैं..! 

कर दूं आजाद उस कोख को,

जिसमे घुट घुट कर मार दी जाती हैं बेटियां।

चाहता हूं मैं..! 

जला दूं उस समाज को उसकी ही आग में,

जिसमे जल जाती हैं बेटियां दहेज के नाम पर।

चाहता हूं मैं..! 

नोच दूं मैं हर उस शख्स की आंखें, 

जो रखते हैं गंदी नियत हर वक्त बेटियों पर।

चाहता हूं मैं..! 

गढ़ना एक नई मातृत्व की परिभाषा, 

जहां सुमन बन महके बेटियां हर आंगन में।

चाहता हूं मैं.! 

बन जाऊं दो वक्त की रोटियां,

उन कच्चे मकानों में रह रहे भूखे पेट बच्चों के लिए।

चाहता हूं मैं..! 

बने एक नया समाज,

जहां ना हो छुआ छूत, भेदभाव एक दूसरे से।

चाहता हूं मैं..! 

मिले सबको अधिकार बराबरी का, 

ताकि सब आगे बढ़े एक बेहतर कल के लिए।

चाहता हूं मैं..! 

हो आपसी प्रेम सद्भाव सभी में,

कूट कूटकर एक दूजे के लिए।

चाहता हूं मैं..! 

मुस्कराहट हो सबके होंठों में,

न ठहरे आंसू किसी के गालों पर गम बनकर।

चाहता हूं मैं..!

घुल जाएं मिश्री सा लबों में सबके,

खुशहाली, प्यार मोहब्बत मिठास बनकर।

चाहता हूं मैं..! 

बहने दूं उम्मीदों को नदी सा अपने ही धुन में निर्जन वादियों में,

क्यों रोको मैं उसे किसी के कहने पर।


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