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राही अंजाना

Abstract

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राही अंजाना

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बुढ़ापे की सनक

बुढ़ापे की सनक

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ख्वाइशें हर एक रोज हमसे झगड़ती रहीं

अंजान होकर के खुद पर ही अकड़ती रहीं


समझाया बहुत मगर समझी एक बार नहीं

हर बार चेहरा बदलकर मुझको पकड़ती रहीं


बचपन से जवानी तक आदतें पाली इतनी

के ताउम्र बुढ़ापे की सनक उन्हें अखरती रहीं।


 


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