बुझी बुझी नदी
बुझी बुझी नदी
कहीं
एक नदी है
बुझी बुझी सी
खामोश बहती हुई
शांत बहती लहरों पर
सितारों की झिलमिल को
मुस्कान की तरह सजाए।
भोर की किरणें
देंती है उलाहने नदी को बहने पर
उसके यूँ मुस्कराने के पर
और छिपा लेती है दिन भर को
सितारों को अपने पीछे।
नदी फिर भी
बहती चलती है चुपचाप
झुलसते हुए सूरज के संग
उम्मीद लिये ठण्डी शाम की ओर।
आसमान में
चढ़ते चाँद को देख
नदी फिर लेगी सितारों से
आभासी मुस्कान अपनी शांत लहरों पर।
वो जताना नहीं चाहती
किसी को भी कुछ भी
जो बहता है घटता है
हर रोज़ हर पहर हर लहर में।
ये उदासी लहरों की उसकी गहरी है।
ये उदासी लहरों की उसकी अपनी है।
