STORYMIRROR

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

4  

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

बुझी बुझी नदी

बुझी बुझी नदी

1 min
385

कहीं

एक नदी है

बुझी बुझी सी

खामोश बहती हुई

शांत बहती लहरों पर

सितारों की झिलमिल को

मुस्कान की तरह सजाए।


भोर की किरणें

देंती है उलाहने नदी को बहने पर

उसके यूँ मुस्कराने के पर

और छिपा लेती है दिन भर को

सितारों को अपने पीछे।


नदी फिर भी

बहती चलती है चुपचाप

झुलसते हुए सूरज के संग

उम्मीद लिये ठण्डी शाम की ओर।


आसमान में

चढ़ते चाँद को देख 

नदी फिर लेगी सितारों से

आभासी मुस्कान अपनी शांत लहरों पर।


वो जताना नहीं चाहती

किसी को भी कुछ भी

जो बहता है घटता है

हर रोज़ हर पहर हर लहर में।


ये उदासी लहरों की उसकी गहरी है।

ये उदासी लहरों की उसकी अपनी है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract