बसंत की पहली प्रेम की बारिश
बसंत की पहली प्रेम की बारिश
बसंत ऋतु का आगमन
कलियों का चटकना
फूलों का खिलना
नई नई कोपलों का फूटना
हरी मुलायम पत्तियों का निकलना
बाग बगीचों का
फूलों की चादर से ढक जाना
क्यारियों का
हरी दूब की लहर संग बह जाना
कोयल का कूकना
चिड़ियों का चहचहाना
मोर का नाचना
तितलियों का फूलों पर मंडराना
भंवरों की गुंजन
नदियों की कल कल
लुप्त थे सब
सबका अपने अज्ञात स्थान से
सहसा निकलकर
एक दूसरे से मिल जाना
बच्चों की टोलियां
आम चूसकर इधर उधर
फेंकी हुई गुठलियां
बर्फ की चुस्की
शीतल जल की फुहार
बदन बूंद बूंद गीला
फव्वारों का नृत्य करता रेला
सुरीला सा वातावरण
उस पर रिमझिम बारिश की फुहार
आनंद को कर दे
दुगना
पेड़, पौधे, फूल, पत्ते,
पक्षी, पशु, इंसान
सब नहाकर तर हुए
इसके स्पंदन से
किसी के चेहरे पर
बारिश के पानी के छींटे पड़े
किसी के तन पर इसकी बौछार
होंठ गुनगुनाने लगे गीत
झूले में झूलते
अपने प्रियतम को याद करते
दिल पर छाने लगी
सावन की प्रीत
मितवा मितवा कहकर पुकारे
बारिश की बूंदों का भी संगीत
सखी सखी मैं आया सखी कहकर
भागा चला आये
बादल के धुएं की कंदील
रेशमी फुहारों में
संगीत भी विद्यमान है
यह बसंत की ऋतु है
यह प्यार का मौसम है
यह दिल खोलकर
सबका स्वागत करने का
समय है
यह आसमान से
जमीन पर उतर रहा
एक प्यार का सागर है
यह प्रेम का आगमन है
इंतजार की घड़ियां खत्म
यह पहला कदम
पहली धड़कन के साथ
उठाते
स्वागत द्वार में पदार्पण
करने का
एक अलौकिक संसार है
यह बसंत की पहली वर्षा की
बूंदों से भीगी कलियों का
मायाजाल है
यह सबको भिगोता
सबको एक धागे में पिरोता
सबका ख्याल रखता
सबको प्यार करता
सबको पल पल महकाता
बसंत की पहली बारिश की
पहले प्रेम सी पहली बौछार है।

