बोलो न तुम कब आओगे
बोलो न तुम कब आओगे
बसंत भी आ गया देखो
कहो तुम कब आओगे
मेरे निर्जन से मन पर
कब नेह पराग बरसाओगे
जाड़े में भी थोड़ी तो नरमी की धूप खिलती है
मगर तुम्हारे आलिंगन में
बसंत में भी कलियाँ नहीं खिलती हैं
भूरे पत्तों के आँचल में हरी कोंपलें मुसका रहीं
सतरंगी तितली नए नए फूलों संग नैन मिला रहीं
मेरे मन के सूने आँगन में कब अमलतास खिलाओगे
बसंत भी आ गया देखो
बोलो न तुम कब आओगे
यूं तो तुम हो मेरे साथ ही
पर फिर भी मन कबका प्यासा है
बाँधा है देह के बंधन में
पर प्रेम को अब भी निराशा है
भँवरे जैसे जब आते हो
कुछ पल को ही सही, लुभाते हो
क्षण भर का बसंत संग लाते हो
पतझड़ मुझको कर जाते हो
अबकी आओ कि बहार बरसे
हल्दी हाथों में श्रृंगार बरसे
आये बसंत इस साल मुझपर
तन मन भर हरसिंगार सजे।
