बंद कमरा
बंद कमरा
निभाती रही वो अपना कर्तव्य
हमेशा प्यार से
किसी ने देखा ही नही उसे
कभी इस तरह से,
वो करती रही हर बार समझोता
अपने आप से
किसी ना किसी रूप में !
वो सहती रही मनमुटाव,
कभी रुठना अपनो का .
वो समझाती रही उन्हे हमेशा,
बड़प्पन दिखाकर
वो सराहती रही प्यार से!
उन्हें अपनी गोद मे संभालकर..
वो चाहे तो रो सकती थी,
बोल सकती थी ,रुठ सकती थी
बता देती अपने दर्द की कहानी!
पर उसने हमेशा
अपनी आँखो मे भरी हुई , नमी को छुपाया
आंसू टपकने लगे तो ?
उसे ..अपने ही दुपट्टेसे से झेल कर
ये कह कर निभाया कि,..
अरे !कोई बात नही..
आंसूओ क्या?
आँखोमे कुछ चला गया तो
ये यूं ही टपकते रहते हैं।
उनका कोई मोल नहीं है इस दुनिया में।
सहते रहना है दर्द को
बस अपने सीने से लागाकर ...
ये भी याद रखना है कि,
अपना दर्द किसी को ना दिखे,!
क्या ये मुमकिन है,
इस जमाने मे आज भी?
कहा उसने,
कहा मैनें ... हा !.?क्यूँ नहीं।
कल भी वो प्याज के जरिये
छिपाया करती थी
अपने आंसु
आज भी नही बदला है उसका
तरीका छुपाने का, सहते रहने का!
बस आजकल वो लिखती रहती है
कुछ पंक्तीया ,कहानियां
अपने आँसुओ के नाम!
दे देती है उधार आंसू
किसी और के नाम..
बदल सी गई है वो,
लगता है कई बार..!
निभाती है अपना वो कर्तव्य
बार बार हमेशा प्यार से...
मगर ...
मगर किसी ने आजतक
देखा ही नही उसे
प्यार भरी नजरों से...!
आजकल वो...
खयालों मे डूबी रहती है अक्सर
कहीं कोई खयाल खुल न जाये
इस डर से,इसी विचार से...
वो छुपके से
अकेलेपन मे सोचना
उसकी आदत सी बन गयी है!
समजदार जो है वो,
वाकिफ है दुनिया की रीती रिवाजो से!
बंद कमरा कभी खुलने न देगा
उसका राज,
यह सोच कर
वो खूश रहती है ,अपने आप से!
अपने आप से!
