STORYMIRROR

Ramanpreet -

Abstract

4  

Ramanpreet -

Abstract

भय

भय

1 min
485

छुपके बैठा है वो

मेरे अन्दर कहीं

पूछती हूँ तो भी

नाम बताता नहीं 

शान्त हो खोजती हूँ तो

अदृश्य हो जाता है कहीं

बस अचानक आता है वो

मेरा मन विचलित करने यूहीं 

हर उस नये मोड़ पर जो

जाता है नई उँचाईयों पर कहीं

शायद यही चाहता है वो

की मैं रहूँ बस सहमी खड़ी यहीं 

लेकिन यकीनन वो

मेरी ताक़त को जानता नहीं

पहचानकर जल्द उसको

मैं उसका अस्तित्व मिटा दूँगी 

और अपनी हर कोशिश को

कामयाबी का सिला दूँगी

हो चाहे कितना भी बड़ा भय वो

मैं उससे भयभीत ना रहूँगी

मैं उससे भयभीत ना रहूँगी


 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract