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Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

4  

Bhawna Kukreti Pandey

Abstract

बहुत पढ़ा प्रेम

बहुत पढ़ा प्रेम

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बहुत पढ़ा

बहुत सुना 

और कुछ-कुछ लिखा भी

सलोने "प्रेम "पर

जो घर की दहलीज और

बाहर भी 

कई रूपों में 

प्रतीकों में

खिलता मुस्कराता

कभी रूठता कभी मनाता

दिखता रहा।


आवेगों में

बहता

संवेगों में उलझता

"प्रेम"

मगर कभी सिर्फ 

"प्रेम " नही रहा

समय, परिस्तिथि और जरूरत

के हाथों 

अनेक स्वरूप बदलता रहा


मन फिर भी 

सब मे सुख से रहा 

कुछ मे दुख से भी भरा

मगर जो भाव नित बना रहा

जो भाव जीता रहा 

वो बस इतना कहता रहा कि

हर जगह

उगता-खिलता 

मुरझाता, मिटता-मिटाता

"प्रेम" 

सिर्फ "प्रेम"

ही क्यों न रहा ?


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