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Ram Chandar Azad

Abstract

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Ram Chandar Azad

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भिखारी

भिखारी

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वह त्याग तपस्या की प्रतिमा

वह सहनशीलता की मूरत

जी, आप समझते होंगे कि

वह कोई संत पुजारी है 

जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं

वह तो बस एक भिखारी है


कौवे पर उसकी नज़र अड़ी

है चोंच में रोटी जिसके पड़ी

जी ,आप समझते होंगे कि

वह कोई चतुर शिकारी है

जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं

वह तो बस एक भिखारी है


जो जाति ,धर्म का भेद न जाने

जो मानव को बस मानव ही माने

जी ,आप समझते होंगे कि

वह कोई धर्माधिकारी है

जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं

वह तो बस एक भिखारी है


सब ऋतुओं में रहता समान

अपमान मान दोनों समान

जो मिल जाता खा लेता है

रूखा –सूखा ,ताज़ा-बासी

जी ,आप समझते होंगे कि

यह किसी की लाचारी है

जी, नहीं-नहीं ,जी नहीं-नहीं

वह तो बस एक भिखारी है 


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