भगवान से बात
भगवान से बात
अचानक
एक दिन
बड़े-से
शॉपिंग मॉल में,
एक छोटे-से
कोने में,
दुबके-से बैठे
मिल गए
भगवान।
मेरी ही तरफ
देख रहे थे
करुण नेत्रों से।
चाहते थे
करना
खूब बातें
मुझसे।
किंतु
न थी
उनकी हिम्मत
किसी को भी
बुलाने की
क्योंकि
बहुत बार
पड़ा था होना
अपमानित उन्हें
इसी कारण।
नहीं आता था
कोई
पास उनके,
सब बिजी जो थे।
कभी कोई
आ भी जाता
तो
झिड़क देता
भगवान को।
मैं भी
जान गया कि
क्यों लोग
दूर भागते हैं
भगवान से?
दरअसल
वो
बात करता है
आदर्श की
न्याय की
नीति की
ज्ञान की
विज्ञान की
मान की
सम्मान की
स्वाभिमान की।
दया-करुणा-क्षमा
प्रेम-उपकार-सहयोग
दान-पुण्य-सद्कर्म
होते हैं
उसकी चर्चा
के विषय ।
बोर हो जाते हैं
तथाकथित धर्मी लोग।
नहीं सुहाती
ऐसी बातें
और
झिड़ककर
चल देते हैं
भगवान को
सब।
अपने अपमान की
विषबुझी बातें
बताते-बताते
फफक पड़ा
भगवान।
''कुछ करो मानव"
लगभग रोते हुए
बोला भगवान।
मैंने कहा,"भगवान !
मैं तो आपका
बनाया हुआ
जीव हूँ।
मैं क्या कर सकता हूंँ ?
पर हां भगवान,
वर्ल्डसिस्टम
करप्ट हो गया है
एंटी वायरस
देगा नहीं काम।
या तो डालो
नयी विंडो
या सीपीयू बदलो
या नया ही
पीसी ले लो
या फिर
मैं कहता हूंँ
सारा का सारा
सिस्टम ही
चेंज कर दो।"
चेहरे पर अज़ीब
भाव थे
भगवान के।
और उन्होंने
दृढ़-निश्चय
के साथ कहा, "लगता है
नया ही
लेना पड़ेगा
किंतु
एक अंतिम
प्रयत्न के बाद।"
