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मिली साहा

Abstract Tragedy

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मिली साहा

Abstract Tragedy

बदल गए नज़ारे

बदल गए नज़ारे

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कोरोना जब से जीवन में आया,

स्कूल, दफ्तर सब घर में ही समाया,


चौबीस घंटे खुला रहता है किचन,

क्या से क्या हो गया हमारा जीवन,


रोज़ नए-नए बनते हैं पकवान,

खाने पर हम हो गए हैं मेहरबान,


मोबाइल लैपटॉप बन गए दोस्त हमारे,

लॉकडाउन कट रहा है इनके ही सहारे,


इन पर ही निभा रहे हम रिश्तेदारी,

गुम होती जा रही अब दुनियादारी,


मिलना -मिलाना सब हुआ खत्म,

भला ये कैसा जीवन जी रहे हैं हम,


रोज की भागम भाग थी जो ठहर गई,

जिंदगी एक पटरी पर आकर रुक गई,


बदल गई जिंदगी बदल गए नज़ारे,

हाय ये कैसे दिन अब आ गए हमारे।


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