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Rajiv Jiya Kumar

Abstract Classics Inspirational

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Rajiv Jiya Kumar

Abstract Classics Inspirational

बड़प्पन

बड़प्पन

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कह रहा हूँ वह सच्चाई 

जो बिसरी नही

बीत गए कई रात

बड़प्पन का जिक्र 

करना है तेरा

रहा था मैं

कई कई पल 

माने बिन तेरे बड़ाई की 

संगी की बात।।


झुक कर आया

रूप रंग भोला दिखाया

मैं थोड़ा था भरमाया

समझ तुझे बिल्कुल न पाया

तुमने ऐसा घात लगाया

गिन बीत जाता दिन

पर सुुबह पाई कहाँ

कोई सी भी रही रात।।


यह बड़प्पन है तेरी

जैसे पीठ घुमाते

कुत्ते लगते हैं भौकने

ठीक वैसे ही तुम

पीठ पर भौंके मेरी

यह ठीक ऐसा लगा

नींद में पड़ा रहा

किया पीठ पीछे तूने

छुरा से आघात।।


सुन सुनाता हूँ

तेरी बडप्पन की कथा

बैठने की साथ मेरे

तेरी औकात थी कहाँ 

बैठा तब भी साथ

सुनी तेरी सारी व्यथा 

चाहा लिख जाऊँ

ईश कृपा से एक नई गाथा

पर तूने लगाई 

भड़काने की लात।।


ग़र है सच में

बड़प्पन थोड़ा भी

तुझ बेगैरत में बचा

ग़र मैं गलत पर तू सच्चा 

तो आ सामने 

रख सच्ची बात अपनी

चला जोड़ने दूनिया


एक नई सी

छोड़ कथन झूठ की जपनी

वर्ना मैैं क्या 

हाथ से निकली तेरी सच्चाई 

हाथ मलता रह जाएगा

सत्य को मत भड़का

सह न पाएगा 

विधाता का प्रतिघात।।


मुझ में तू मिल जाएगा

मेरी सबसे छोटी अँगुली 

का बन पाने को नाखून

कई कई जन्म 

लेना तुझे पड़ेगा

बडप्पन तेरा रखा

रह जाएगा तेरे 

घर के दिराख पर

दाग अमिट लगेगा

तेरी बुनी हर साख पर

पीट सिर रह जाएगा

खाएगा ऐसा तू मात।।


बहुत करना है

बहुत सहना है

ग़र धुन रही

यही तेरी बनी

बडप्पन बिसरा कर तेरा

सबसे तेरी रहेगी ठनी

द्वार तू मेरे आया

मैं समझा खुशी

मेरे जन की संग लाया


खुश हो हम सब इठलाए

पर तब दिखाई तूने फितरत

अपनी और अपनों की

पहचान अपनी,अपनी जात

बड़प्पन तेरी न भूलने की बात 

न भूलने की बात।।


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