बचपन का प्रेम, भाग-3
बचपन का प्रेम, भाग-3
कसुरे निगाओं की सज़ा ये थी,
उनसे नज़रें मिलाने की खता जो की।
इस ख़ता के लिए तो,कई ख़ता भी क़ुर्बान
उनको ये अन्दाज़ ख़ूब पसंद आया।
भीड़ में नज़रें उनपे ही जो टिका पाया
हमने बचपन के ख़्वाब को,
साकार सा होता पाया।
मन ही मन खुदा तेरा,
शुक्रिया अदा भी कर पाया।
प्यार का अद्भुत ऐहसास जो कर पाया
हर किसी में प्यार ही प्यार नज़र आया।
निमंत्रण का पूर्ण लाभ भी मिल पाया
फिर शुरू हुई हमारी प्रेम कहनी।
कभी कॉल तो कभी मेसिज की ज़ुबानी
औरों से थी थोड़ी सी अंजानी।
बचपन का प्रेम जवाँ हो गया
दो प्रेमियों का मिलन जब हो गया।
मेरी नज़रें उनके पायल की दीवानी,
तो उनकी आँखे मेरी दाढ़ी की मस्तानी थी।
जोड़ी हमारी मानो बाज़ीराव-मस्तानी थी
प्यार में था जुनून ही जुनून,
रिश्तों के न टूटने का था सुकून।
फिर ऐसा क्या हुआ,जो खुदा रूठ गया
बिन कुछ कहे सुने रिश्ता टूट गया।
अब तक न जाना वजह क्या थी ?
बिछड़ने की मुझे सज़ा क्यों दी ?
आज भी तेरा इंतज़ार है, तू हाँ कर या ना कर
पर दूर जाने की एक वजह तो बयाँ कर।
