बच्चों की सुरक्षा
बच्चों की सुरक्षा
एक पक्षी,
दिन रात उड़ता,
इधर उधर घूमता,
सुरक्षित जगह देखता,
जहां बच्चे दे सके,
और फिर उनकी,
परवरिश कर सके।
उसे एक दिन,
एक जगह दिखी,
उसने तिनके, मिट्टी, घास-फूस और लकड़ीयों से,
अपना घोंसला बनाया,
वहां पर बच्चे दिए,
और उनकी परवरिश करने लगा।
वो हर सुबह,
तड़के उठता,
लंबी उड़ान भरता,
अनाज के दाने चुगता,
वापस लौटता,
एक एक करके,
बच्चों के,
मुहं में डालता,
और उनकी भूख मिटाता।
इस तरह से,
ये पक्षी,
बहुत बुद्धिमता से,
हर वो काम करता,
जो हम इंसान करते।
लेकिन ये परियावरण से,
दोस्ती निभाता,
और हम परियावरण से,
गिन गिन के,
दुश्मनी निकालते।
ये खाना भी,
उतना खाता,
जितना आवश्यक।
घोंसला भी,
उतना बनाता।
ये और इसका परिवार,
रह पाए।
हर बात सीमित,
उतना ही करता,
जितना आवश्यक।
प्रकृति को,
कभी नहीं लूटता,
बल्कि उसके,
फलने फूलने में,
मदद करता।
अरे! इंसानों,
इन दुर्बल प्राणियों से,
कुछ सीखो।
कैसे बिना,
नुकसान पहुंचाए,
जी सकते।
सबसे दोस्ती,
निभा सकते।
हमारी बात देखो,
ये हमें,
कोई नुक्सान नहीं पहुंचाते,
हम फिर भी,
इनके घोंसले,
उजाड़ देते।
चलो कुछ ऐसा करें,
हम सब,
इस धरती को,
मित्र द्वीप,
घोषित करें।
जहां सब मिलजुल कर रहेगें,
किसी का कोई,
नुकसान न करेंगे।
हर कोई,
अपनी सीमाओं में,
सुखद एहसास भरेगा।
