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संजय कुमार

Abstract

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संजय कुमार

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बैरी चाँद

बैरी चाँद

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समझा था मैंने जिसे एक

छोटा सा दिल का टुकड़ा

था वो मेरे दिल की जान।

क्या कहूं,था मैं जिसके पीछे

भाग रहा बनकर दीवाना

वह निकला कैसा बैरी चाँद।


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