बैर
बैर
बैर नहीं पालना मुझे किसी से
बैर है ही नहीं मुझे किसी से!
जानती हूँ मैं-
बैर की दुश्मनी हर किसी से
दोस्ती है नहीं उसकी किसी से!
देखें हैं बैर के रूप हज़ारों हज़ार
काट कर रख देता बन औज़ार
हमारी संवेदना को-
इतनी नुकीली,तीव्र उसकी धार
कि पल में कर जाए उसे तार तार!
हर सुन्दर उद्वेग को,जला जला कर
बुद्धि,विवेक को तिलांजली दे कर
कर देता है राख
उस की लीपा-पोती ख़ुद पर कर-
पोत कर कालिख , इतराता उम्र भर !
क्या खोया,कितना खोया,नहीं अंदाज़ा
ज़हरीले विचारों से ख़ुद को नवाज़ा
खो दिया माधुर्य
कोमलता का बंद कर दिया दरवाज़ा
संयम , सहिष्णुता का निकाला जनाज़ा!
विषैलेपन ने छीन ली विचक्षण शक्ति,बैर ने-
दुनिया के रंगो,उमंगों,उल्लास,धैर्य से
कर लिया किनारा
लगे खुशियों से ,अपनों से मुंह मोड़ने
बेरंग,बेहाल,उदास, किया पल में किसी ग़ैर ने!
बैर है अपना दुश्मन , कर देगा जीना दुश्वार
अपना भी,औरों का भी-जीवन के दिन चार
सूखे नीरस कड़क पत्ते की तरह
होंगे दूभर,वंचित हर खुशी से-जब बैर खूंखार
कस कर हमें अपने शिकंजे मे,करता रहेगा वार!
बैर से दोस्ती नहीं है करनी मुझे,चाहूं अगर प्यार-
इस दुनिया से,अपनों से,खुद से कैसे माँगू प्यार-
जो दें हम वही तो मिलेगा
क्यों बांटूं नफ़रत और बैर चाहूं अगर मैं प्यार
सार्थक जीवन करना चाहूँ अगर- दूं प्यार,लूं प्यार!
