STORYMIRROR

अनिल कुमार निश्छल

Abstract

3  

अनिल कुमार निश्छल

Abstract

और फिर हार जाओगे

और फिर हार जाओगे

1 min
444

चुना हुआ है हम सबने तुमको

अब हमपे ही रौब जमाओगे

सच को सच कह दें तो क्या

लाठी-डंडों से पिटवाओगे


पले-बढ़े पाकर शह हमारी,

हमको ही आँख दिखाओगे

क्या झूठा क्या सच्चा है अब

बार-बार हमें बतलाओगे


काला अक्षर भैंस बराबर,

साक्षरों को ज्ञान सिखाओगे

हक़ जो मांगेंगे तुमसे फिर,

आपस में ही लड़वाओगे


दर्द तुमसे हम जो जतायेंगें,

ज़ख्मो में मिर्च लगाओगे

बाँट दिये जो जाति,पाँति में

नफ़रत की खेती कराओगे


आँखों से आँख मिलाकर,

तुम्हें आईना हम दिखायेगें

माँगेंगे फिर भी हक़ अपना,

यह देश हमारा भी तो है।


अभी तक ज़मीर जिंदा है,

जोर-जोर से चिल्लायेंगे

हम तुमको आईना दिखायेंगे

हाँ तुमको हक़ीक़त बतायेगें


क्यों कि अभी जिंदा हैं हम

क्योंकि हम बोल सकते हैं

क्योंकि हम सुन सकते हैं

क्योंकि हम चल सकते हैं


अभिव्यक्ति जिंदा है हमारी,

अभी आत्मा मरी नहीं है

अभी हम पे आदमी जिंदा है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract