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Kavita Sharrma

Abstract Inspirational

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Kavita Sharrma

Abstract Inspirational

अनुभव

अनुभव

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किसने सोचा था कि

रोज़ भागती हुई ज़िन्दगी में

दो पल सुकून की तलाश में

घूमते हुए,

कभी इतने लंबे वक्त के लिए

एक अजीब से सन्नाटे का

सामना करना पड़ेगा?


किसने सोचा था कि-

हर रोज़ की छोटी मोटी परेशानियों को

सुलझाने के लिए, एक दिन

उन्हीं पुराने दिनों को याद कर,

हम नम आंखों से मुस्कुराएंगे।


किसने सोचा था कि-

रोज़ मर्रा की बातें जैसे

"बेटा उठ जा सुबह के छह बज चुके हैं,

बेटा ज़रा बाज़ार से आते वक्त सब्ज़ी ले आना"

वो हर छोटी बात, 

वो मां बाप की छिपी प्यार भरी डांट,

काफ़ी लम्बा वक्त बीत चुका है इन्हे सुन।


किसने सोचा था कि-

जिन दोस्तों के साथ किसी न किसी

बहाने रोज़ मुलाकात होती थी,

बिन वजह हँसी ठिठोली होती थी,

बस अब उन पलों को याद कर ही

वक्त काटना होगा।


किसने सोचा था कि एक दिन

ऐसा भी आयेगा,

जहां ये सब रुक सा जायेगा,

ये आलम थम सा जायेगा।


हां माना, वक्त काफ़ी अजीब सा है,

मगर वक्त ही तो है ना,

कभी न कभी बीत ही जायेगा,

हां! पर इस बार काफ़ी लंबा वक्त चाहिए

इस "वक्त" को भी बीतने में,

क्यों कि पिछले कुछ सालों के

पन्नों को अगर पलट कर देखा जाए, 

तो काफ़ी लंबे वक्त के लिए,

परेशान तो हमने भी काफ़ी

किया है इस वक्त को!


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