Hurry up! before its gone. Grab the BESTSELLERS now.
Hurry up! before its gone. Grab the BESTSELLERS now.

Chandra Prabha

Abstract


4  

Chandra Prabha

Abstract


अनकही व्यथा

अनकही व्यथा

1 min 217 1 min 217


मैं किसी की अनकही व्यथा हूँ,

पास आकर भी जिसे है लौट जाना,

अभिव्यक्ति द्वारों पर आकर भी,

जिसे है लौट जाना। 


नयनकोरों को भिगोकर भी,

अश्रु लिए ही लौट जाना। 

वाणी का आधार पाकर भी, 

रुद्ध हो मुख से लौट जाना,


लिए कितने उच्छ्वास,

लिए कितने विश्वास, 

मन ही मन में रह जाना,

भरी भरी ही रह जाना। 


 आँखों में घुमड़ते सावन हैं,

मुख में गरजते बादल हैं,

पर इतना सा भी आधार नहीं, 

इतना सा भी अधिकार नहीं ,

कि सावन जरा बरस ले, 

कि बादल ज़रा गरज ले।


                     


Rate this content
Log in

More hindi poem from Chandra Prabha

Similar hindi poem from Abstract