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Shalinee Pankaj

Abstract

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Shalinee Pankaj

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अनजान सफर अजनबी के साथ

अनजान सफर अजनबी के साथ

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सफर अनजान ही तो था,

जब शुरू की

एक अजनबी के साथ

सात फेरे ले

रस्मों-रिवाजों के साथ


कच्ची-पक्की

पगडंडियां थी

लड़खड़ाते कदम कभी 

तो कभी अनजाना भय था

और एक अनजान सफर

के हम दो राही


जब साथ चले

एक-दूजे का हाथ थामे

मुश्किलें कम हुई

राहें आसान


हर सफर अब

सुहाना लगने लगा

कुछ मीलों की दूरी में भी 

मिठास बढ़ने लगी।


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