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Suresh Kulkarni

Abstract

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Suresh Kulkarni

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अक्स

अक्स

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अक्स देखकर आईने में

मन फूले नहीं समाता

मन फूले नहीं समाता


खुद को समझता 

सदगुणों का पुतला

मैं और अकड़ जाता

और अकड़ जाता


मानो मिसाल शालीनता की

मूरत हूँ सभ्यता की

पर जब जब मैं परखूँ खुद को

रंग न्यारे दिखते 

रंग निराले दिखते


पहचान नहीं पाता

खुद को पहचान नहीं पाता

बाहर से जितना मोहक

अंदर से भयानक लगता

अंदर से भयावह लगता


फिर अपनी ही नजरों मे

मैं अकसर गिर जाता

अकसर गिर जाता

कितना हूँ मैं फरेबी 

और कितना हूँ मैं सच्चा

यही सोचने लगता

यही सोचने लगता


इसलिये ऐ सज्जनों

पहले खुद को पहचानो

जान लो ठीक तरह से

फिर फिकर करो दुनिया की

फितरत समझ लो अपनी

फिर फितरत उनकी नापना



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