STORYMIRROR

Rashi Rai

Abstract

4  

Rashi Rai

Abstract

अकेला सफऱ एक दुर्गम पहाड़ी तक

अकेला सफऱ एक दुर्गम पहाड़ी तक

1 min
603

कुछ सुनी सुनाई खबरों से

कुछ कही देखी बातों से

भी बेखबर

मैं एक रोज चल पड़ी

एक खोज में बढ़ चली


बिना सोचे कि जो मै सोच रही

वैसा कुछ होगा ये मुमकिन नहीं

बिना ये जाने असलियत

बहुत मुश्किलें देती है

कई बार दिल धड़का

कई बार मैं काँप गयी कुछ मेरे साथ

बुरा ना हो ऐसा सोचने से ही


पर ये जिद थी मेरी

कुछ भी हो जाये जो सोचा है वहां तक

तो जाऊँगी ही

सोचना बोलना बड़ा आसान है पर

झूझना झेलना और सामना करके

आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है


और मै इस दुर्गम राह पे चलके

किसी को उस पे अकेले जाने का

सुझाव नहीं दूंगी

मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश रखी

कि मुश्किल में ना फ़ँस जाऊँ


कुछ भगवान का आशीर्वाद

कुछ मेरी किस्मत कहो

फजीहत मे पड़ने के बावजूद

मैं अपने गंतव्य तक पहुँच गयी !


अपने आप पे भरोसा रखें

मुश्किलों मे तो बहुत ज्यादा

वो दौर चला जायेगा

आपका जेहन याद कर मुस्कुराएगा


अपने आज को बेहतर बनाओ

अपने आपको काबिल बना

बाकि सब तो देख सुनके बन ही जायेंगे

ये था मेरा अकेला सफर

एक दुर्गम पहाड़ी तक का।


రచనకు రేటింగ్ ఇవ్వండి
లాగిన్

Similar hindi poem from Abstract