अगर ...
अगर ...
उन पलकों के पीछे छिपे मौन को अगर मैं पढ पाती।
अधरों पर रुके उन शब्दोॅ को मैॅ आधा भी अगर समझ पाती।।
कैसा होता जीवन अगर तुम कुछ बोलते या मैं कुछ कह पाती।
तुम्हारे मन के कोरे कागज़ पर लिखे भाव अगर मैं देख पाती।।
दिन नहीं अब तो सालों गुजर गए।
दिन नहीं... अब तो सालों गुजर गए।।
अब तो यही एक जुस्तजू है दिल में बस।
उसके साये को अगर बस एक झलक ही देख पाती।।
कितने अफसाने सुनाने को होते आज।
कितने अफसाने...सुनाने को होते आज।।
काष अगर आज तुम होते पास।
काष अगर आज ... बस तुम होते पास।।

