मुझसे मैं जाती रही
मुझसे मैं जाती रही
मेरे पास के सब जो वाष्प बन उड़े।
जीने की आस भी जाती रही।।
चहूं ओर अन्धकार से घिर।
चित्त की लौ भी जाती रही।।
मन के टीस के उठते उफान से।
मेरे अधरों की हंसी भी जाती रही।।
बाहर की चकाचौंध से स्तब्ध।
आंखों की चमक भी जाती रही।।
जीवन के ऊंचे नीचे पथ पर चल।
चाल की मृदुलता भी जाती रही।।
किसी के प्रशस्ति के बिन।
गाल की लाली भी जाती रही।।
किसी के सुनने के अभाव में।
कुछ बोलने की इच्छा भी जाती रही।।
जीने के पल बीतते रहे।
मुझसे मैं जाती रही।।
तब अंतर्मन के चक्षु खोल।
स्वयं के भीतर झांकती रही।।
जब मन के संशय त्यागे।
हरि धुन मन में समाई गई।।
बाहरी भ्रांति से उन्मुक्त हरि प्रेम।
नवजीवन की मन में आस लाई।।
श्याम ही शाश्वत बाकी माया।
यही एक सत्य अब मैं जान गई।।
