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Ashu Kapoor

Abstract

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Ashu Kapoor

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अधूरी डायरी

अधूरी डायरी

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कुछ दर्द, कुछ गम,

कुछ खलिश--- जब दिल में दबी रह जाती है,

जब जज्बातों के बीजों को,

मिट्टी ना सही मिल पाती है,


भावों के अनुरूप कहीं-‐- जब शब्द नहीं मिल पाते हैं

शब्द अगर मिल भी गए तो,

अर्थ कहीं खो जाते हैं,

इस शब्द - अर्थ के चक्कर में,

यह दिल जब पागल होता है,


मन में भरी घुटन को---

जब राह नहीं कोई मिलती है,

बस उसी पल,

यह डायरी अधूरी रह जाती है,

जब अंतर्मन का दर्द कहीं,


कागज पर फैल ना पाता है,

जब टुकड़े-टुकड़े दर्द पिघल कर

आंखों से बहता रहता है,

जब दर्द-ए-ग़म को लिखते लिखते--


शब्द सभी चुक जाते हैं,

जब -जब एहसासों के,

काफिए तंग पड़ जाते हैं,

जब खोज - खोज जज्बात मेरे----


यह कलम भी थक थक जाती है,

बस उसी पल----- हां--- बस उसी पल,

ये डायरी अधूरी रह जाती है !


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