अधूरी डायरी
अधूरी डायरी
कुछ दर्द, कुछ गम,
कुछ खलिश--- जब दिल में दबी रह जाती है,
जब जज्बातों के बीजों को,
मिट्टी ना सही मिल पाती है,
भावों के अनुरूप कहीं-‐- जब शब्द नहीं मिल पाते हैं
शब्द अगर मिल भी गए तो,
अर्थ कहीं खो जाते हैं,
इस शब्द - अर्थ के चक्कर में,
यह दिल जब पागल होता है,
मन में भरी घुटन को---
जब राह नहीं कोई मिलती है,
बस उसी पल,
यह डायरी अधूरी रह जाती है,
जब अंतर्मन का दर्द कहीं,
कागज पर फैल ना पाता है,
जब टुकड़े-टुकड़े दर्द पिघल कर
आंखों से बहता रहता है,
जब दर्द-ए-ग़म को लिखते लिखते--
शब्द सभी चुक जाते हैं,
जब -जब एहसासों के,
काफिए तंग पड़ जाते हैं,
जब खोज - खोज जज्बात मेरे----
यह कलम भी थक थक जाती है,
बस उसी पल----- हां--- बस उसी पल,
ये डायरी अधूरी रह जाती है !
